मेडीटेशंस - प्रथम अध्याय (किश्त - ६)
१६ अपने पिता में मैंने सीखा: नम्र स्वभाव, पूरे सोच विचार के बाद लिए गए निर्णयों के साथ अडिग होकर खड़े रहना; तरह तरह के सम्मानों, तारीफों व दिखावों में तनिक रूचि न रखना; मेहनत व कभी हार न मानने वाला जुझारूपन; हमेशा ऐसी बात सुनने को समय देना व तैयार रहन...
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Rahul Singh
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[14 Oct 2009 10:25 AM]



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