शायद फ़िक्र हो..

Shreesh UVACH स्मार्ट दूकानदार, मुस्कुराकर, अठन्नी वापस नहीं करता..  शायद फ़िक्र हो.. भिखमंगों की. नये कपड़ों की जरूरत  लगातार बनी रहती है  शायद फ़िक्र हो हमें, अधनंगों की.  चीजें कुछ फैशन के लिहाज से पुरानी पड़ जाती हैं,  इमारतों को फ़िक्... [पूरी पोस्ट]
writer श्रीश पाठक 'प्रखर'
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[07 Oct 2009 17:04 PM]

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