व्यंग्यजल -दशहरा है तो क्या कर दूँ ,दिवाली है तो क्या कर दूँ?

virendra jain ke nashtar व्यंग्यजल वीरेन्द्र जैन दशहरा है तो क्या कर दूँ, दिवाली है तो क्या कर दूँ हमारी जेब जब खाली की खाली है तो क्या कर दूँ तुम्हारे पास नेता के लिए अलफाज अच्छे हैं हमारे पास बस अश्लील गाली है तो क्या कर दूँ इसे समझाउँ तो वो लोग हत्थे से उखड़ते हैं मुहल्ले... [पूरी पोस्ट]
writer वीरेन्द्र जैन
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[10 Oct 2009 14:26 PM]

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