व्यंग्यजल भूत प्रेतों को भज रही दुनिया

virendra jain ke nashtar व्यंग्जल भूत प्रेतों को भज रही दुनिया भूत प्रेतों को भज रही दुनिया आदमी से उलझ रही दुनिया हम भी गृह लक्ष्मी को ढोते हैं हम को उल्लू समझ रही दुनिया ऐसे आभुषणों के फैशन हैं बम मिसाइल से सज़ रही दुनिया उसकी ज़ुल्फों से होड लेती है जाने कब से सुलझ रही दुनि... [पूरी पोस्ट]
writer वीरेन्द्र जैन
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[13 Oct 2009 07:55 AM]

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