फिर भी ना जाने क्यो-(प्रेम का एक रुप ये भी)

चिंतन मेरे मन का फिर भी ना जाने क्यो- प्रेम अर्थ है, प्रेम समर्थ है, फिर भी ना जाने क्यो व्यर्थ है॥ प्रेम आरजू है, प्रेम तपस्या है, फिर भी ना जाने क्यों निराशा है॥ प्रेम चेष्टा है, प्रेम निष्ठा है, फिर भी ना जाने क्यों रुठा है॥ प्रेम शक्ति है, प्रेम अनुभूति है, फिर भ... [पूरी पोस्ट]
writer प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
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[06 Oct 2009 14:47 PM]

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