यत्रांणा से मुक्त कर दो

मेरी रचनाऍ यत्रांणा से मुक्त कर दो   रिक्तता मुझको निगल ले   इससे पहले उस दिशा में  प्रस्थान कर दो   व्योम सा व्यापक नहीं हूँ मैं   ना समुद्र सी गहराई मुझ में   मैं तो दीर्ध निश्वासों की कड़ी हूँ  मुझ में अविकल प्राण भर दो &nb... [पूरी पोस्ट]
writer विपिन बिहारी गोयल
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[12 Oct 2009 05:00 AM]

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