मेरा खुदा
लगती हैं रोज़ लम्बी.. लम्बी सी ये कतारें चढ़ चढ़ के एक दूजे.. के ऊपर से हैं सब बढ़ते फैली हुई है हर सू धूपों की ये खुशबू मावों के चढावों से भर गए हैं इबादतघर सिक्कों और नोटों के गट्ठे चढ़ चुके हैं कहीं पंडों की आरती है.. कहीं मौलवी की अजां है फ़लक पर...
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केतन कनौजिया 'शाइर'
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[11 Oct 2009 13:10 PM]



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