उधार की शहरी जिंदगी
उमेश पाठक यू तो सबकी जिंदगी जीने के अपने तरीके होते हैं और हर आदमी अपने हिसाब से ही जीता है लेकिन शहरी जिंदगी का अपना अलग ही रूप है ! इस भौतिक युग में जहा आम आदमी दाल - रोटी से जूझ रहा है वहीँ शहरी मध्य वर्ग अपनी आवश्यकताओं / उपभोग की वस्तुओं के लिए...
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Umesh Pathak / उमेश पाठक
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[09 Oct 2009 14:26 PM]



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