खामोशी
उन दिनों मैं समझा करता था तुम्हें सर्वस्व , और भटकता था तुम्हारे साहचर्य में बना हुआ 'अहम् ब्रह्मास्मि' | उस भोले से मस्तिष्क के सबसे सुदूर कोने को भी कहाँ ज्ञात था , कि जब हम गुजार रहे होंगे निश्चिंत रातें सोफे पर लम्बी टांगें पसारकर, तुम आओगी एक दि...
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धीर.
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[11 Oct 2009 01:49 AM]



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