दीप-पीड़ा
कभी-कभी ऐसा भी होता है, जिंदगी के रोज़ बदले चेहरों में, चुपचाप जलते दीप के नीचे खामोश पनपते अंधेरों में | मांगता हैं कोई, मौन ही अपना अंश का खोया प्रकाश, बाँटकर चहूँ ओर रश्मि-उल्लास| फिर देखकर अपना नीड़ निराश, सोचता है अनवरत निर्विकार देकर ...
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Sudhir (सुधीर)
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[06 Oct 2009 14:00 PM]



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