साँसों में लिपटी पड़ी है मिट्टी, लोग उठाते क्यों नहीं.
इश्क का है फ़साना, सबको खुल कर बताते क्यों नहीं. दिल पे हैं ज़ख्म कई, ग़ज़ल कोई गुनगुनाते क्यों नहीं वो कहते हैं कि इश्क में शर्म-औ'-हया हैं पिछले ज़माने की बातें, हमने तो कह दिया है खुलकर, तुम अब नजरें मिलाते क्यों नहीं बहुत मजाजी है मिजाज़-ए-यार...
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Sudhir (सुधीर)
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[14 Oct 2009 10:18 AM]



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