कविता

स्मृति-दीर्घा ... हश्र              अजब चलन है मेरे शहर का; यहाँ, हवा के लिए सोने के ताले हैं चाँदी की दीवारें पत्थर के हैं शीशे पारे की साँसें.. सब मुमकिन है बस, इक बहने की इजाज़त के सिवा... अजब चलन है मेरे... [पूरी पोस्ट]
writer काजल कुमार Kajal Kumar
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[11 Oct 2009 02:12 AM]

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