"दिवास्वप्न"
बहुत ज़रूरी है, जीवन में वह सांसों की तरह--- मैं उसे अंतर तक समा लेती हूँ, सांसों की ही तरह, पर उसे, मेरे अंतर में सिमटने से, घुटन होती है---- वह आकाश की ऊंचाइयों को छूना चाहता है, पक्षियों-सा उड़ना चाहता है, पर्वतों पर उछलना चाहता है, तितलियों के रं...
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Jyotsna Pandey
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[12 Oct 2009 11:48 AM]



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