उम्मीद
ढ़ाई साल पहले उदासी और उम्मीद के जाने कैसे नमकीन मौसम में ये कविता लिखी गई थी। कल सफाई करते हुए पुरानी किताबों के बीच कागज के एक टुकड़े पर लिखी मिली। उम्मीद कभी भी आती है जब सबसे नाउम्मीद होते हैं दिन अनगिनत अधसोई उनींदी रातों और उन रातों में जलती...
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मनीषा पांडे
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[14 Oct 2009 10:17 AM]



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