मेरी नींद तो लौटाता जा, कम्बख्त!
बज रहे हैं अंधेरा बस समेटने ही वाला है रातभर की कमाई। बांध लेगा अपनी पोटली में घबराहट से टूटे खिड़कियों पर टंगे सपने। परदों से झांककर चुराई मोहब्बत में भीगी चादरें। उनीदें सीनों पर औंधी सोई पड़ी किताबें। रजाई के अंदर जारी मोबाइल फोन्स की खुसर-फुसर। द...
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विवेक
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[14 Oct 2009 10:17 AM]



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