तिनका है बना पतवार कहीं

गीत-ग़ज़ल ले चल मुझको तू पार जरा तिनका है बना पतवार कहीं चलना है धारा के सँग-सँग हूँ बीच नहीं मझधार कहीं डगमगाया है तूफाँ ने जितना उतना ही तू दमदार कहीं चाहत ले आती है रँग इतने इस रौनक का तू हक़दार कहीं चिड़ियाँ चहचहाती हैं तो जरुर सुबह किनारे की है तरफदार कहीं... [पूरी पोस्ट]
writer शारदा अरोरा
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[06 Oct 2009 01:53 AM]

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