छोटी-सी एक ग़ज़ल

अंतर्द्वंद का आइना घर की तामीर चाहे जैसी हो इसमें रोने की जगह रखना! जिस्म में फैलने लगा है शहर अपनी तन्हाईयाँ बचा रखना! मस्जिदें हैं नमाजियों के लिए अपने दिल में कहीं खुदा रखना! मिलना-जुलना जहाँ जरुरी हो मिलने-जुलने का हौसला रखना! उम्र करने को है पचास को पार कौन है किस... [पूरी पोस्ट]
writer V. VIVEK
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[06 Oct 2009 09:06 AM]

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