टूटी आस्थाएं

bhardwaj'sblog ढह गए विश्वास टूटी आस्थाएं; दर्द बन कर रह गईं हैं प्रार्थनाएं। प्रश्नचिन्हों से घिरे हैं न्यायमंदिर, हाथ में कुरआन गीता हम उठाएं। दीप की जलती हुई लौ तो बुझातीं, आग को पर और दहकातीं हवाएं। कौन के आगे करें शिकवा शिकायत, जब बिना अपराध ही मिलतीं सजाएं। थ... [पूरी पोस्ट]
writer chandrabhan bhardwaj
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[10 Oct 2009 04:33 AM]

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