एक प्रौढ़ लड़की

feminist poems रिसता है कुछ दिल से आँखों के रास्ते मन के ज़ख्मों के टाँके टूट गये हैं शायद, बड़ी मुश्किल से सुखाती हूँ इन्हें फिर कोई पूछ ही लेता है घर के बारे में माँ-पिता के बारे में अजूबा सा लगता होगा एक प्रौढ़ लड़की बिना अभिभावक के अकेले कैसे काटती है ज़िंदगी,... [पूरी पोस्ट]
writer mukti
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[06 Oct 2009 16:09 PM]

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