हां सर्वस्व मेरे.......!
सर्वस्व मेरे ! तम छंटा.. हूं मैं तुम्हारे आलोक में । क्या है ... निजशेष उठा लिया है अपनी गोद में तुम्हारी दृष्टि का सावन मुसलाधार है या मद्धम ज्ञात अब क्या बचा है । तुम्हारे आशीर्वचनों ने समूचे दुःखों को हर लिया ...! हां सर्वस्व मेरे.....!...
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हेमन्त कुमार
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[06 Oct 2009 10:45 AM]



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