उसके उड़ानों के कोई पंख न काटे....

कलरव एक नारी अपनी ही बिरादरी की कैसे हो जाती है दुश्मन शुरू हो जाता है अत्याचारों का सिलसिला.. एक, दो,तीन ही नहीं अनेकों प्रताड़ना है कि अपना स्वरूप बदल-बदल कर आ जाती है सामने रुकने का नाम ही नहीं लेती शायद वह भूल जाती है उसने भी लिया होगा मां के ही कोख से... [पूरी पोस्ट]
writer हेमन्त कुमार
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[14 Oct 2009 10:13 AM]

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