ए चौदहवी के चांद - सुहानी रात ढल चुकी है,, ना जाने तुम कब आओगे?

दिलीप के दिल से पिछला हफ़्ता बडा़ ही हट के गया. याने पिछले हफ़्ते एक शब्द चांद बार बार कानों पर पडा़, क्योंकि बात साफ़ है. पिछले हफ़्ते शरद पुर्णिमा की मदहोश रात थी. सुनते आये हैं, कि इस रात को चंद्रमा से अमृत बरसता है. लगता है सही है, क्योंकि, पिछले कई सालों से बिना ना... [पूरी पोस्ट]
writer दिलीप कवठेकर
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[11 Oct 2009 23:37 PM]

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