मूक अभिवादन
घर की परिधि के दायरे मेरे मानचित्र पर बिंदु से उस पगडंडी पर रहते हैं जहाँ सूर्योदय रोज़ तुम्हारे द्वार पर लौटती सूर्य किरण की प्रतीक्षा करता है पहाड़ी के उस ओर से बादलों की टोली को हवा धकेल ले आती है और गुलदावदी के फूल हवा को छुपा कर यूँ ही लहकते फ़िरते...
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रजनी भार्गव
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[08 Oct 2009 09:27 AM]



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