देखना ये है
ज़माना तो हुआ दुश्मन हमारा देखना ये है तुम्हारी आँख देती क्या इशारा देखना ये है सहे तूफ़ान भी मंझधार के तेवर बहुत देखे सुकूं दे पायेगा कितना किनारा देखना ये है तुम्हारी बज्म से उठ कर चले थे सूरमा कितने पलट कर आ सके कितने दुबारा देखना ये है हुआ है अस्त...
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jogeshwar garg
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[12 Oct 2009 08:48 AM]



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