माया की माया

कछु ह‍मरी सुनि लीजै संत कबीरदास शताब्दियों पहले कह गए थे  कि ''माया महाठगिनि हम जानी''। इस 'हम' में वे खुद  और उनके कुछेक समकालीन संत रहे होंगे जिन्‍होंने माया के असली रूप को समझ लिया। पर हम  दुनियावालों की समझ में यह बात  तब क्‍या, अब तक भी नहीं आई... [पूरी पोस्ट]
writer डॉ. कमलकांत बुधकर
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[09 Oct 2009 03:56 AM]

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