चार दिन की ज़िन्दगी...

मौत भी शायराना चाहता हूँ..! ये माना ज़िन्दगी है चार दिन की बहुत होते हैं यारों चार दिन भी खुदा को पा गया वाईज़, मगर है जरुरत आदमी को आदमी की मिला हूं मुस्कुरा कर उस से हर बार मगर आंखों में भी थी कुछ नमी सी मोहब्बत में कहें क्या हाल दिल का खुशी ही काम आती है ना गम ही भरी महफ़िल... [पूरी पोस्ट]
writer रामकृष्ण गौतम

ज़िन्दगी

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[11 Oct 2009 08:25 AM]

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