मून स्ट्रक
शाम समय इक ऊंची सीढ़ियों वाले घर के आंगन में, चांद को उतरे देखा हमने चांद भी कैसा पूरा चांद! इंशाजी इन चाहने वाली, देखने वाली आंखों ने मुल्कों-मुल्कों, शहरों-शहरों , कैसा-कैसा देखा चांद? हर इक चांद की अपनी धज थी, हर इक चांद का अपना रूप..... लेकिन ऐसा...
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Rajiv K Mishra : Roam-antic Realist
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[08 Oct 2009 08:28 AM]



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