टूटे सपनों के साथ बेपहिया ज़िंदगी
प्रभाकर मणि तिवारी ‘एक छोटी कार के आने की सूचना ने हमारी ज़िंदगी में पंख लगा दिए थे। हम सबकी आंखों ने न जाने कितने ही सुनहरे सपने देखे थे। लेकिन बीते एक साल से तो हम अपने पैरों पर खड़े होने के काबिल भी नहीं रह गए हैं। बस, यूं समझ लीजिए कि हम टूटे सपन...
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प्रभाकर मणि तिवारी
सिंगुर
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[06 Oct 2009 12:13 PM]



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