कुछ दोहे
जो अपनी औकात में रहकर करता बात उसको सभ्य समाज की पड़े कभी ना लात भूल गया निज वक़्त तू कुर्सी पा भरमाय घूस खाए चोरी करे सबकी लेता हाय तुझको लगता था बुरा, जो औरों का कर्म वही कर्म अब तू करे , गई कहाँ तेरी शर्म कुर्सी के बल कूदता , कहाँ गए संस्कार ...
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योगेश स्वप्न
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[13 Oct 2009 08:16 AM]



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