जाने क्या हुआ अचानक
कुछ रास्तों पर मैं चलता था, वो राहें जानी अन्जानी सी, ना मेरी मन्ज़िल की ख़बर उन्हें, मेरे लिए भी रही वो हमेशा बेगानी सी, फिर एक मोड़ मुड़ा, एक राह मिली, जिस से एक पुराना नाता था, कुछ देर को मैं भी ठहर गया, कब से इधर उधर भटकता जाता था, पहले बिठाया अपन...
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Gurnam Singh Sodhi
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[09 Oct 2009 00:44 AM]



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