लौ को अपने दीप पर कुछ प्राण का विश्वास तो हो
शमन के अंतिम चरण में आस थरथराती क्यों हो लौ को अपने दीप पर कुछ प्राण का विश्वास तो हो शांत हो जलती कभी तो संग स्पंदन के थिरकती रात की स्याही से अपने रूप को रंग कर निखरती देह जल कर भस्म हो उस ताप में, पर मन नहाये अश्रु-जल की बूँद से वह पूर्ण सागर तक स...
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मानसी
poetry
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[07 Oct 2009 07:00 AM]



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