आज कुछ माँगती हूँ प्रिय...
आज कुछ माँगती हूँ मैं प्रिय क्या दे सकोगे तुम ? मौन का मौन में प्रत्युत्तर अनछुये छुअन का अहसास देर तक चुप्पी को बाँधे खेलो अपने आसपास क्या ऐसी सीमा में खुद को प्रिय बांध सकोगे तुम? आज कुछ माँगती हूँ प्रिय... तुम्हारे इक छोटे से दुख से जो मेरा मन भर...
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मानसी
poetry
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[12 Oct 2009 14:01 PM]



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