मेरा गुलसितां था नया नया

अनुभूतियाँ थी अभी कली तो चटक रही, अभी फूल था बस अधखिला क्यूँ ख़बर खिज़ाओं को मिल गई, मेरा गुलसितां था नया नया जो न मंज़िलें हैं नसीब में, मुझको न कोई मलाल है बस ख़त्म हो न कभी मेरे कदमो तले है जो रास्ता उस शाम पाकड़ के तले तुमने गले जो लगाया था इन सर्दियों में हर... [पूरी पोस्ट]
writer प्रताप नारायण सिंह
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[05 Oct 2009 08:20 AM]

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