किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी...
इन आँखों से दिन-रात बरसात होगी अगर ज़िंदगी सर्फ़-ए-जज़्बात होगी मुसाफ़िर हो तुम भी, मुसाफ़िर हैं हम भी किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी सदाओं को अल्फाज़ मिलने न पायें न बादल घिरेंगे न बरसात होगी चराग़ों को आँखों में महफूज़ रखना बड़ी दूर तक रात ही रात ह...
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रामकृष्ण गौतम
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[05 Oct 2009 08:18 AM]



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