जब भीतर बरसात न हो तो इन की लिपटन सुहाती ही है
पर जब भीतर बरसात न हो तो इन की लिपटन सुहाती ही है....... कल रात सोते सोते से लन्दन का मौसम एकदम बदल गया | लगता है, रात-भर बरखा हुई......
पर रात को तो लिखते हुए मैं देर तक जग ही रही थी, बिना आहट टिम टिम बुदकी-सी फुहार गिरी जान पड़ती है | इसी ठण्डऔर बू...
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कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee
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[05 Oct 2009 06:08 AM]



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