जनता बनाम पशु – एक व्यंग्य
भारतीय लोक तंत्र में कार्यपालिका और न्यायपालिका की समझ में थोड़ा फर्क है। न्यायपालिका बार बार अपने निर्णयों में कहती रहती है कि संविधान के अनुच्छेद 21 में जीवन के अधिकार का आशय पशुवत जीवन से नहीं है, अपितु मनुष्य के प्रतिष्ठा-पूर्ण जीवन का अधिकार है।...
[पूरी पोस्ट]
विनय ओझा 'स्नेहिल'
11
2
0
2
1
[05 Oct 2009 05:23 AM]



Shuffle








