कश्मीर

कुछ पन्ने मेरी दराज़ से.... चांदी सी रोशन वादी सुर्ख लाल हो गयीं हैं, सरहदें जोड़ती झेलम, वादी में मौन हो गयी है रहती थी जो अमन से यहाँ जाने कहाँ वो शान्ति खो गयी है. लगी है शायद नज़र कांगडी को आंच से वो अब अंगार हो गयी है. डल के शिकारों से बहती मोहब्बत जिहाद का शिकार हो गयी है.... [पूरी पोस्ट]
writer ●๋• नीर ஐ

My Poems

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[05 Oct 2009 02:45 AM]

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