एक मनीषी का महाप्रयाण
काशी डॉ. विश्वनाथ प्रसाद इतनी जल्दी लौकिक जीवन त्याग कर पारलौकिक जगत में आसन जमा लेंगे, ऐसी आशंका किसी को नहीं थी। पता नहीं कब और कैसै कैंसर के विषाणु उनके मस्तिष्क में घुसे, उसका एहसास उन्हें भी नहीं हो पाया। न कभी सिर में दर्द हुआ, न कभी सिर बोझिल...
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बच्चन सिंह
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[05 Oct 2009 01:34 AM]



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