साथ ऐसे रहें, जैसे परिवार हों,

निनाद गाथा पुनः प्रेषित - ज़रा बदलाव के साथ हम गुनहगार हों, चाहे बीमार हों, चाहे लाचार हों, चाहे बेकार हों, जो भी हों चाहे, जैसे भी हों दोस्तों, साथ ऐसे रहें, जैसे परिवार हों, कुछ नियम से बहे स्वस्थ आलोचना, हो दिशा सूर्योन्मुख सकारात्मक, व्यर्थ में जो करे बात व... [पूरी पोस्ट]
writer अभिनव
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[05 Oct 2009 00:20 AM]

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