वो प्रेम का त्यौहार हूँ
मधुऋतु की कोमल बयार हूँ गले का आशातीत हार हूँ आया हूँ तुमसे मिलने मैं जीवन की मधुता का सार हूँ खुशबू बिखेरूँ चमन में कर दूँ समर्पित आगमन में मुरझा न सके जिसको अनल मैं सुमन वो नव आकार हूँ मलय जिसे उड़ा न सके जलाधार जिसे डिगा न सके निकलेंगी लहरी हर ऋतु...
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धीर.
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[03 Oct 2009 09:20 AM]



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