कविता
भाव को संजोए वह शब्द से लिपट गयी कहीं छन्द सी खनकती प्रकृति के निकट गयी कभी शरमाई मन घूँघट से ताकती कभी सबकी पीड़ा के अंतर में झाँकती कभी सकुचाई सम-सामयिक को बांचती चिंतन के चितवन से देखती समाज को तोड़ छन्द - बँध काव्य रीति के अनुबंध धर्म-जाति , राज...
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Jyotsna Pandey
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[03 Oct 2009 08:11 AM]



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