एक आत्मस्वीकारोक्ति के बहाने कुछ सवाल–2
अब जब ये आदत नहीं रही तो इस पर किसी सार्वजनिक मंच से बात करना बहुत नहीं तो थोड़ा आसान जरूर हो गया है। ये बिलकुल वैसा ही है जैसे चोरी छोड़ देने के बाद कोई दार्शनिक लहजे में यह स्वीकारे कि कभी वो चोर हुआ करता था। जिस आदत को मैं दुनिया से छिपाती फिरी क...
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मनीषा पांडे
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[02 Oct 2009 16:02 PM]



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