बूढ़ा जाते है मां बाप
टूटता है जब मनोबल तो घर देता है सम्बल घर में - मां है , बाबूजी है जिनकी छाह तले और भी किले है । नेह के धागों में मन के मनके पिरोकर छककर करता है अमृतपान फिर बढ़ता है -दरखत मनोबल का धीरे-धीरे उन पर चढ़ने लगती है स्वार्थों की फंफूद बरगदसी बाहें फैलाये आका...
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Vimla Bhandari
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[02 Oct 2009 13:12 PM]



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