जिंदगी का उलाहना

मेरी रचनाऍ जिंदगी मुझको उलाहना दे रही है   कुछ घाँव जो पाले थे मैंने अपनों की तरह  दर्द वो अब देते नहीं बेगानों की तरह   किस तरह होगी बसर कुछ समझ आता नहीं   पर जिंदगी का उलाहना भी तो भाता नहीं   राह के हर पत्ते पर तेरा नाम लिख कर ... [पूरी पोस्ट]
writer विपिन बिहारी गोयल
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[02 Oct 2009 11:02 AM]

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