इतने बुतों के ढेर पर बैठा है आदमी

नवागंतुक इतने बुतों के ढेर पर बैठा है आदमी कि आज अपने आप में तनहा है आदमी| अपने खुदा के नाम पर मरना तो है कबूल इंसां से किस कदर यहाँ खफा है आदमी | किस किस की आह पर भला अब जिंदगी रुके, कब जिंदगी की आह पर ठहरा है आदमी| कल डूबते रहे कोई तिनका नहीं मिला , क्यों इ... [पूरी पोस्ट]
writer Alok Shankar
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[02 Oct 2009 05:05 AM]

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