दफ़ीना जो हाथ लगा...

Aalok Shrivastav कभी-कभी कुछ शे'र दफ़ीने की तरह हाथ लगते हैं. चमकते हैं, झिलमिलाते हैं. लेकिन उनकी क़ीमत का एहसास नहीं जागता. ऐसे ही तीन शे'र महीनों से ज़हन में गड़े पड़े थे. 30 सितम्बर को जबलपुर में जब ये शे'र, कवि भाई प्रदीप चौबे को सुनाए तो उन्होंने कान ऊमेठ कर कह... [पूरी पोस्ट]
writer aalok shrivastav

प्रदीप चौबे

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[02 Oct 2009 05:00 AM]

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