पंचायती राज में नारी : इधर हारी, उधर भारी

चेतना के स्वर उजाले की ओर यह नारी है। कहने को तो क्लिष्ट शब्दजाल, सौंदर्य, घुंघरू, पायल, मेहंदी, कुलगौरव, विरह, वेदना, करूणा और भी न जाने अनगिनत संबोधन साहित्यकारों ने इसे दिए। यह कहा जाए कि संसार सागर नारी रूपी नीर के बगैर सूखा है तो गलत नहीं होगा। भारत समेत विभिन्न देशों मे... [पूरी पोस्ट]
writer चेतना के स्वर
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[02 Oct 2009 03:22 AM]

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