वो देखो एक इंसान ... [ कविता] - श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'

तृषा'कान्त' वो देखो एक इंसान पागल सा वर्तमान के चीथड़ों को लपेटे अतीत की सुई से सीता सा वो देखो …. गांधी का डंडा सुभाष की आवाज भगत की फाँसी का फन्दा गले में डालता सा वो देखो …. हँसते है सडक़ चलते लोग छात्र.. नेता ... अभिनेता और कर्मचारी दु कानदार.. पुलिस... अफसर... [पूरी पोस्ट]
writer श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’
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[02 Oct 2009 02:41 AM]

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