अपनी मुक्ति में

GORAKHH तुम पापों का पक्ष तपों की गति प्रतीक्षा या संदेह! वो सृष्टि तजि हुई काया सी रंधित जिसे अवशेष समझ चढ़ाए थे चढापे ढकी थी चादर गंगा का आचमन यक्ष धूप अभिक्त टंकारे यथा जयकारे होगा पारायण भेद-अभेद मुक्ति द्वार बरबस निहारेंगे दिशाओं के संकेत छोड़ भी दो चाप... [पूरी पोस्ट]
writer Gopal Singh
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[01 Oct 2009 13:51 PM]

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