अनकही

कुछ बातें... शाम कुछ बोझिल सी है सुबह थकी-थकी उदास है दरिया के करीब हूँ फिर भी बुझती नहीं प्‍यास है अब रोने पर आंख में आंसू नहीं आते ग़मों इस कदर अपने हैं कि मुझसे दूर नहीं जाते चाहकर भी हम उन्‍हें भुला नहीं पाते हम भूले से भी उन्‍हें याद नहीं आते बात कहने को कई... [पूरी पोस्ट]
writer भारत मल्‍होत्रा
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[01 Oct 2009 11:54 AM]

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